<p>अपनी उत्पत्ति से ही सिनेमा एक प्रभावशाली सामाजिक माध्यम रहा है, लेकिन समानांतर सिनेमा के दौर में उसने अपनी भूमिका को एक नई ऊँचाई दी। यहाँ फ़िल्में दर्शक को पलायनवादी आनंद नहीं देती थीं, बल्कि उससे सक्रिय बौद्धिक सहभागिता की अपेक्षा रखती थीं। ये फ़िल्में सरल उत्तर नहीं देती थीं; वे कठिन प्रश्न छोड़ जाती थीं, ऐसे प्रश्न जो सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद भी दर्शक के भीतर चलते रहते थे और उसे अपने समय, समाज और स्वयं के बारे में पुनर्विचार करने को प्रेरित करते थे।</p>
<p>आर्ट सिनेमा मूलतः व्यावसायिक सिनेमा के वर्चस्व के विरुद्ध एक कलात्मक और वैचारिक प्रतिरोध था। जहाँ मुख्यधारा का सिनेमा बॉक्स ऑफिस, सितारों और तयशुदा फॉर्मूलों पर निर्भर था, वहीं समानांतर सिनेमा यथार्थ, सामाजिक सरोकार और कलात्मक ईमानदारी पर आधारित था। यहाँ भव्य सेट, गीत-संगीत और अतिरंजित ड्रामे की जगह जीवन की खुरदुरी सच्चाइयाँ थीं, अर्थात वर्ग संघर्ष, जाति की जकड़न, स्त्री की स्थिति, सत्ता की निर्ममता और आम आदमी की रोज़मर्रा की त्रासदी। इस सिनेमा का नायक कोई असाधारण व्यक्तित्व नहीं, बल्कि साधारण मनुष्य था, जो अपनी सीमाओं और परिस्थितियों से जूझते हुए भी सच के साथ खड़ा रहता था।</p>
<h2>समानांतर सिनेमा का उदय और सामाजिक पृष्ठभूमि</h2>
<p>भारत में स्वतंत्रता के बाद के दशकों, विशेषकर 1950 से 1980 के बीच का सामाजिक और राजनीतिक वातावरण इस सिनेमा के लिए अत्यंत उपजाऊ सिद्ध हुआ। नेहरूवादी समाजवाद के आदर्शों और ज़मीनी यथार्थ के बीच की बढ़ती खाई, विभाजन की स्मृतियाँ, शहरीकरण, बेरोज़गारी और राजनीतिक मोहभंग ने रचनात्मक चेतना को प्रश्नाकुल बनाया। इसी पृष्ठभूमि में सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’ ने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई और यह सिद्ध किया कि गरीबी और मानवीय संघर्ष भी उच्च कलात्मक गरिमा के साथ प्रस्तुत किए जा सकते हैं। रे के साथ ऋत्विक घटक और मृणाल सेन—बंगाल की इस त्रयी ने भारतीय सिनेमा की भाषा और दृष्टि को निर्णायक रूप से बदल दिया।</p>
<p>ऋत्विक घटक की फ़िल्मों में विभाजन और विस्थापन का सामूहिक दर्द गहरे करुण भाव के साथ उभरता है, जबकि मृणाल सेन का सिनेमा मध्यवर्गीय नैतिकता, राजनीतिक असंतोष और शहरी बेचैनी पर तीखे प्रश्न खड़े करता है। हिंदी सिनेमा में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सईद अख़्तर मिर्ज़ा, मणि कौल, कुमार शाहनी, बासु भट्टाचार्य, बासु चटर्जी और केतन मेहता जैसे निर्देशकों ने इस वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाया। ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’, ‘गरम हवा’ और ‘तमस’ जैसी फ़िल्में आज भी भारतीय समाज के जीवंत दृश्य दस्तावेज़ के रूप में देखी जाती हैं।</p>
<h2>विचार, विवेक और संवेदना का सार्वजनिक मंच</h2>
<p>इस दौर की फ़िल्में वास्तव में विचार, विवेक और संवेदना तीनों का सार्वजनिक मंच थीं। विचार के स्तर पर ये फ़िल्में दर्शक को बौद्धिक चुनौती देती थीं और व्यवस्था की सड़ांध, बेरोज़गारी, शोषण और अलगाव पर गहरे विमर्श प्रस्तुत करती थीं। विवेक के स्तर पर इन्होंने जाति व्यवस्था, सामंतवाद, स्त्री शोषण, पुलिस बर्बरता और राज्य-सत्ता की हिंसा को बिना किसी अलंकरण के उजागर किया। संवेदना के स्तर पर यह सिनेमा मानवीय अनुभवों की सूक्ष्म परतों तक पहुँचता था, जहाँ मौन संवादों से अधिक मुखर हो जाता था।</p>
<p>नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, अमोल पालेकर, फारूक़ शेख़, पंकज कपूर, दीप्ति नवल, सुरेखा सीकरी और नीना गुप्ता जैसे कलाकारों ने अभिनय को मात्र प्रस्तुति नहीं, बल्कि अनुभव में बदल दिया। उनके चेहरे, उनकी आँखें और उनकी चुप्पियाँ उस समाज की कहानी कहती थीं, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता था। दर्शक इन किरदारों के माध्यम से ‘दूसरे’ के दर्द को महसूस करना सीखता था और यही आर्ट सिनेमा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।</p>
<h2>बाज़ार के विस्तार के बीच बदलता सिनेमा</h2>
<p>1990 के दशक के बाद आर्थिक उदारीकरण, उपभोक्तावाद, टेलीविजन और बाद में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के विस्तार ने सिनेमा को एक बार फिर बाज़ार-केंद्रित बना दिया। NFDC और दूरदर्शन जैसी संस्थाओं का संरक्षण कमजोर पड़ा और दर्शकों की देखने की आदतों में भी बदलाव आया। गहराई और ठहराव की जगह त्वरित उत्तेजना ने ले ली। साथ ही, प्रश्न पूछने वाला सिनेमा असहज लगने लगा, क्योंकि यह सहमति नहीं, आत्ममंथन की माँग करता था।</p>
<h2>समानांतर सिनेमा की विरासत और भविष्य</h2>
<p>फिर भी, समानांतर सिनेमा की विरासत समाप्त नहीं हुई है। हंसल मेहता, चैतन्य ताम्हाने, नीरज घेवन, रीमा दास, नंदिता दास और अनुराग कश्यप जैसे समकालीन फिल्मकार उसी वैचारिक धारा के उत्तराधिकारी हैं। फर्क़ केवल इतना है कि आज यह सिनेमा मुख्यधारा में नहीं, बल्कि हाशिए पर खड़ा है और दर्शक को स्वयं उसे खोजने की ज़रूरत पड़ती है।</p>
<p>अंततः, ‘जब सिनेमा विचार, विवेक और संवेदना का सार्वजनिक मंच था’ यह केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक मानक है। यह हमें याद दिलाता है कि सिनेमा में समाज को शिक्षित करने, उसे आईना दिखाने और उसे अधिक मानवीय बनाने की अद्भुत क्षमता है। आर्ट फ़िल्में आज भी हमें यह सिखाती हैं कि सच्चा मनोरंजन वही है, जो हमें भीतर से थोड़ा और सजग, थोड़ा और संवेदनशील बना दे।</p>