साहित्य
जब सिनेमा विचार, विवेक और संवेदना का सार्वजनिक मंच था - कमल के पाण्डेय
सिनेमा के इतिहास में एक दौर ऐसा भी रहा है जब फ़िल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं थीं, बल्कि वे समाज का दर्पण, बौद्धिक विमर्श का केंद्र और मानवीय संवेदनाओं की गहन पड़ताल का माध्यम थीं। इस दौर को हम भारत में ‘आर्ट सिनेमा’ या ‘समानांतर सिनेमा’ के स्वर्ण युग के रूप में जानते हैं। यह वह समय था जब सिनेमा सपनों का सौदागर नहीं, बल्कि समाज की अंतरात्मा का सजग प्रहरी था, जो प्रश्न करता था, असहज करता था और सोचने को विवश करता था।
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